कुण्डलिनी ध्यान ओशो द्वारा सुझाई गई एक गहन साधना प्रक्रिया है, जो ऊर्जा के प्रवाह को जाग्रत और संतुलित करती है। यह ध्यान विशेष रूप से आधुनिक मनुष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है, जिसमें व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्तर पर स्वतंत्रता मिलती है। इस ध्यान को चार चरणों में किया जाता है, प्रत्येक चरण 15 मिनट का होता है।
कुण्डलिनी ध्यान की प्रक्रिया:
पहला चरण: 15 मिनट (झकझोरना)
- आरामदायक स्थिति में खड़े हो जाएं और आंखें बंद कर लें।
- अपने शरीर को प्राकृतिक रूप से झकझोरें (शेकिंग करें)। यह झकझोरना ऊर्जा को जागृत करने में सहायक होता है।
- शरीर को पूरी तरह से छोड़ दें और झकझोरने की प्रक्रिया का आनंद लें। इसे बलपूर्वक न करें; शरीर को स्वाभाविक रूप से हिलने दें।
दूसरा चरण: 15 मिनट (नृत्य)
- संगीत के साथ अपने शरीर को स्वतंत्र रूप से नाचने दें।
- किसी नियम या संयम के बिना, पूरी तरह से आत्मसमर्पण करें।
- नृत्य करते समय अपनी ऊर्जा और आनंद का अनुभव करें।

तीसरा चरण: 15 मिनट (स्थिरता और साक्षीभाव)
- नृत्य बंद करें और जहां हैं वहीं स्थिर खड़े हो जाएं।
- आंखें बंद कर लें और अपने भीतर के अनुभवों को देखें।
- ध्यान दें कि आपकी ऊर्जा कैसे प्रवाहित हो रही है।
चौथा चरण: 15 मिनट (विश्राम)
- फर्श पर लेट जाएं और पूरी तरह से आराम करें।
- किसी भी प्रकार की क्रिया न करें, केवल शिथिल होकर अपनी ऊर्जा का अनुभव करें।
महत्वपूर्ण बिंदु:
- यह ध्यान शाम के समय, सूर्यास्त के आस-पास करना अधिक प्रभावी होता है।
- इसे खुली जगह या एकांत में किया जा सकता है।
- ध्यान के दौरान अपनी चेतना को पूरी तरह से अनुभव करने का प्रयास करें।
ओशो के अनुसार, कुण्डलिनी ध्यान हमारी ऊर्जा को स्वाभाविक रूप से प्रवाहित करने और जीवन की गहराई में उतरने का एक शक्तिशाली साधन है। इसे नियमित रूप से करने पर आंतरिक शांति और जागरूकता बढ़ती है।

