ओशो का जीवन और योगदान (विस्तृत विवरण)
पूरा नाम: रजनीश चंद्र मोहन जैन
जन्म: 11 दिसंबर 1931
जन्मस्थान: कुचवाड़ा गाँव, रायसेन जिला, मध्य प्रदेश, भारत
मृत्यु: 19 जनवरी 1990, पुणे, महाराष्ट्र
प्रसिद्धि: ध्यान, तंत्र, जीवन-दर्शन, और आत्मज्ञान पर आधारित शिक्षाएँ।
प्रारंभिक जीवन:
- ओशो का जन्म जैन परिवार में हुआ, और वे अपने माता-पिता की 11 संतानों में सबसे बड़े थे।
- बचपन से ही वे एक तेज-तर्रार, जिज्ञासु और साहसी व्यक्तित्व के धनी थे। उन्होंने बचपन में ही परंपरागत धर्म, रीति-रिवाजों और मान्यताओं पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे।
- उनके दादा-दादी ने उनका पालन-पोषण किया, और इस स्वतंत्र वातावरण ने उनके भीतर गहन आत्म-अन्वेषण की जिज्ञासा उत्पन्न की।
- ओशो को युवावस्था में ही ध्यान और आत्मज्ञान की ओर गहरी रुचि थी।
शिक्षा और प्रारंभिक कार्य:
- उन्होंने जबलपुर विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में स्नातक किया और बाद में सागर विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की।
- वे अपने विश्वविद्यालय के समय से ही वाद-विवाद और दर्शन में माहिर हो गए थे और "रजनीश द रिबेल" के नाम से प्रसिद्ध हो गए थे।
- कुछ समय तक वे जबलपुर विश्वविद्यालय में दर्शन के प्रोफेसर के रूप में कार्यरत रहे।
आध्यात्मिक यात्रा:
- ओशो ने 21 वर्ष की आयु में 21 मार्च 1953 को जबलपुर में आत्मज्ञान प्राप्त किया।
- आत्मज्ञान प्राप्ति के बाद उन्होंने भारत के विभिन्न हिस्सों में यात्राएँ कीं, जहाँ उन्होंने अपने विचार और ध्यान की तकनीकों का प्रचार किया।
- उन्होंने 1960 के दशक में "आचार्य रजनीश" के नाम से प्रवचन देने शुरू किए। उनके विचारों ने लाखों लोगों को प्रभावित किया, लेकिन उनके विवादित दृष्टिकोण ने आलोचना भी झेली।
ओशो की शिक्षाएँ:
ओशो ने अपनी शिक्षाओं को पारंपरिक धर्म और आध्यात्मिकता से अलग रखा। उनकी शिक्षाओं के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
ध्यान और जागरूकता:
- "ध्यान" ओशो की शिक्षाओं का केंद्र है। उन्होंने कहा कि ध्यान ही आत्म-ज्ञान और शांति का मार्ग है।
- उन्होंने 112 ध्यान तकनीकों की व्याख्या की, जो "विज्ञान भैरव तंत्र" पर आधारित हैं।
प्रेम और संबंध:
- ओशो के अनुसार, प्रेम एक स्वाभाविक अवस्था है। उन्होंने कहा कि सच्चा प्रेम वही है जो स्वतंत्रता देता है, न कि बंधन।
आत्म-खोज:
- उन्होंने लोगों को अपने भीतर झाँकने और अपना सत्य खोजने पर जोर दिया।
- उनका संदेश था, "आपको अपना उत्तर स्वयं खोजना होगा। कोई और आपका उद्धार नहीं कर सकता।"
धर्म और समाज पर आलोचना:
- ओशो ने संगठित धर्मों की आलोचना की और उन्हें मनुष्य की स्वतंत्रता और विकास में बाधा बताया।
- उन्होंने पारंपरिक नैतिकता को त्यागकर व्यक्तिगत अनुभव और जागरूकता पर जोर दिया।
ओशो के प्रमुख योगदान:
डायनामिक ध्यान:
उन्होंने आधुनिक जीवनशैली को ध्यान में रखते हुए सक्रिय ध्यान (Dynamic Meditation) की विधियाँ विकसित कीं। इसमें शारीरिक और मानसिक ऊर्जा को मुक्त करने के लिए तेज़ श्वास, कूदना, और नृत्य जैसी क्रियाएँ शामिल हैं।रजनीशपुरम:
1981 में, ओशो ने अमेरिका के ओरेगन राज्य में एक विशाल आश्रम (रजनीशपुरम) स्थापित किया। यह जगह उनकी शिक्षाओं का केंद्र बन गई, लेकिन प्रशासनिक विवादों और कानूनी समस्याओं के कारण इसे बंद करना पड़ा।पुणे आश्रम:
1974 में ओशो ने पुणे में अपना आश्रम स्थापित किया, जिसे आज ओशो इंटरनेशनल मेडिटेशन रिज़ॉर्ट के नाम से जाना जाता है।
विवाद और आलोचना:
- सेक्स पर खुलापन: ओशो ने सेक्स को पवित्र ऊर्जा माना और इसे दबाने के बजाय इसे जागरूकता के साथ जीने की बात कही। उनके इस दृष्टिकोण ने उन्हें "सेक्स गुरु" का टैग दिलाया।
- धर्म और राजनीति पर विचार: ओशो ने संगठित धर्मों और राजनीति की खुलकर आलोचना की, जिससे पारंपरिक धार्मिक नेताओं और सरकारों के साथ उनका टकराव हुआ।
- अमेरिका का निर्वासन: 1985 में ओशो को अमेरिका से निर्वासित कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने दुनिया के कई देशों में यात्राएँ कीं।
मृत्यु:
ओशो का निधन 19 जनवरी 1990 को पुणे में हुआ। उनकी समाधि पर लिखा गया है:
"नेवर बॉर्न, नेवर डाइड। जस्ट विज़िटेड दिस प्लानेट अर्थ बिटवीन 11 दिसम्बर 1931 - 19 जनवरी 1990।"
ओशो का प्रभाव:
- आज ओशो की शिक्षाएँ और ध्यान विधियाँ 100 से अधिक देशों में प्रचलित हैं।
- उनके प्रवचनों के हजारों वीडियो और किताबें प्रकाशित हुई हैं।
ओशो की जीवन यात्रा, उनकी शिक्षाएँ, और उनके विवाद आज भी लोगों को प्रेरित करते हैं और सोचने पर मजबूर करते हैं।

